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बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

"विज्ञापन " न ही मेरा मन न ही मेरा तन ,......ओम कश्यप.




"विज्ञापन " न ही मेरा मन न ही मेरा तन ,
ऐसी हे मेरी पहचान व्यापार में डाल दूँ जान !
आओ बताऊ अपने बारे मे ,
वादे करता ढेरो सारे मे !
मुझे बनाने वाले हैं बहुत महान ,
कैसे करू उनका बखान !
आओ देखो आज का जमाना ,
हर किसी ने लोहा मेरा माना !
हर जगह हर स्थान पर में देखा जाऊ ,
अपने बारे में और ज्यादा क्या बताऊ !
कभी-कभी तो मे हो जाता इतना हिट ,
बन जाता हूँ बहुत फेवरिट !
नित्य नवीन रूप बनाया ,
सब ने मुझे अपनाया !
कभी तो दुःख मुझे भी आया ,
जब में कार्यक्रम के बीच में आया !
बटन दबा आपने दूसरा चेनल लगाया ,
मैंने नहीं किसी का दिल दुखाया !
सब फुले-फले यही सन्देश सुनाया ,
अंत में दोस्तों यही कहूँगा !
में होता अत्यन्त ही छोटा ,
मैंने हर किसी के लिए धन लूटा !
मैंने हर किसी के लिए धन लूटा !!


21 टिप्‍पणियां:

  1. कश्यप जी,
    वादे करता ढेरो सारे में !
    मुझे बनाने वाले हैं बहुत महान ,
    कैसे करू उनका बखान !
    आओ देखो आज का जमाना ,
    हर किसी लोहा मेरा माना !
    ...कमाल की बात कही है
    सच को उजागर करती आपकी ये रचना....बधाई स्वीकारें।

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  2. भाई वाकई,
    ला-जवाब" जबर्दस्त!!
    ........दमदार शानदार रचना.

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  3. वाह भाई वाह
    क्या बात कही
    “मैने हर किसी के लिए धन लूटा“
    सत्य वचन

    उत्तर देंहटाएं
  4. आज का एनिमेशन अच्छा लगा

    उत्तर देंहटाएं
  5. अंत में दोस्तों यही कहूँगा !
    में होता अत्यन्त ही छोटा ,
    मैंने हर किसी के लिए धन लूटा !
    मैंने हर किसी के लिए धन लूटा !!


    आपका कहना सही है ....वाह विज्ञापन क्या बात है

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  6. थोडा हट कर है , अच्छी लगी ये रचना ।

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  7. कश्यप् जी
    विज्ञापन पर अच्छा प्रकाश डाला। बहुत खूब

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  8. अलग सी अच्छी रचना ....वैसे भी आजकल बिना चहरे मोहरे वाले विज्ञापन खूब छाये हुए हैं.....

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  9. sanjay ji
    deepak ji
    surendra ji
    kewal ram ji
    zeal ji
    mukesh ji
    or dr. monika ji
    aap sabhi ka bahau bahut dhanywad
    aabhar

    उत्तर देंहटाएं
  10. om ji bhut bhtrin or shukriyaa bhi . akhtar khan akela kota raajsthan

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  11. ..वाह विज्ञापन क्या बात है

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  12. अंत में दोस्तों यही कहूँगा !
    में होता अत्यन्त ही छोटा ,
    मैंने हर किसी के लिए धन लूटा !
    मैंने हर किसी के लिए धन लूटा !!
    ..बहुत बढ़िया.. कविता के नीचे जो डिसुम-डिसुम आ रहा है वह बहुत ही अच्छा लगा ... हमें तो यह सब ब्लॉग पर आता ही नहीं.. खैर कभी पूछ लिया करेंगे.. हार्दिक शुभकामनायें

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  13. आपकी कवितायेँ जरा हट कर होतीं हैं .....
    जरा अलग सा एहसास सुखद होता है .....

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  14. बहुत ही बढ़िया रचना.
    एक लाइन मेरी तरफ से जोड़ दें.
    "मैंने हर किसी का धन लूटा".
    शुभ कामनाएं.

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  15. JAI KRASHAN JI
    AKHTAR JI
    TILAK JI
    OR SURENDER JI
    aap sabhi ka bahau bahut dhanywad
    aabhar

    उत्तर देंहटाएं
  16. KAWITA JI
    HARKIRAT JI
    OR SAGEBOB JI
    aap sabhi ka bahut bahut dhanywad
    aabhar

    उत्तर देंहटाएं
  17. आपका कहना सही है| अच्छी लगी ये रचना|

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  18. सोचने को मजबूर करती है आपकी यह रचना !
    शुभ कामनाएं.

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